- कौस्तुभ उपाध्याय
एलन मस्क के ग्रोक (Grok) ने वर्चुअल दुनिया में एक नई हलचल मचा दी है। अपने बिंदास अंदाज़ और खरी-खरी बातों के चलते ग्रोक माइक्रो ब्लॉगिंग साइट X पर अपनी लॉन्चिंग के साथ ही सोशल मीडिया पर छा सा गया है। ग्रोक की भाषा-शैली और कंटेंट पर चारों ओर गर्मागर्म चर्चाएं हो रही हैं। ग्रोक के इस धमाके से कुछ ही दिन पहले चीन के डीप सिंक AI भी दुनिया में एक बड़ा तहलका मचा चुका है। इसकी लॉन्चिंग के चलते ग्राफिक कार्ड बनाने वाली अमेरिका की दिग्गज टेक कंपनी इनवीडिया के शेयर को एक ही दिन में करीब 21 बिलियन डॉलर का नुकसान हुआ था। इसने दुनिया की अर्थव्यवस्था पर अमेरिका के दबदबा घटने और AI के आर्थिक प्रभावों को लेकर बहस को तेज कर दिया। इससे पहले भी AI के चलते रोजगार पर पड़ने वाली मार और AI के बेकाबू होने के खतरों तक पर बहस होती रही है। इन सारी जरूरी बहसों के बावजूद AI से जुड़ी एक बेहद जरूरी बहस पूरे परिप्रेक्ष्य से अबतक तकरीबन नदारद है। यह बहस है AI के पर्यावरणीय प्रभावों की, जो फिलहाल ज्यादा जोर-शोर से कहीं भी होती दिखाई नहीं दे रही है।
दरअसल AI आने वाले दिनों में किस तरह हमारी आबोहवा (क्लाइमेट) और हमारी धरती की सेहत के लिए एक बड़ी समस्या बन सकता है, इससे आमतौर पर लोग फिलहाल बेखबर हैं। इसकी वजह AI के इन्वायरमेंटल इफेक्ट्स के बारे में अभी लोगों को काफी कम जानकारी होना है। हालांकि समझदारी तो इसमें है कि इस समस्या के विकराल होने से पहले ही हम इसके बारे में सचेत हो जाएं और इससे निपटने के उपायों पर विचार-विमर्श शुरू कर दें। क्योंकि, AI के बढ़ते उपयोग से ऊर्जा खपत, कार्बन उत्सर्जन, और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन जैसी समस्याएं आने वाले दिनों में हमारे पर्यावरण को तेजी से प्रभावित करने वाली हैं। आज हम आपसे इसी की बात करने जा रहे हैं कि AI किस-किस तरह से हमारे पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों को प्रभावित करने वाला है। इसे कुछ इस प्रकार से समझा जा सकता है:
1. भारी मात्रा में बिजली की खपत
जलवायु के लिए AI का सबसे बड़ा जोखिम इसके लिए आवश्यक भारी-भरकम कंप्यूटिंग और डेटा प्रोसेसिंग के चलते पैदा होता है। किसी भी AI मॉडल के संचालन और उसको विकसित व प्रशिक्षित करने के लिए भारी मात्रा में डेटा प्रोसेसिंग की जाती है, जिसके लिए भारी मात्रा में बिजली की खपत होती है। एक बड़े AI मॉडल में हजारों किलोवाट-घंटे बिजली इस्तेमाल होती है, जो लाखों घरों के सालाना बिजली की खपत के बराबर हो सकती है। इसमें से ज्यादतर बिजली फिलहाल थर्मल पावर प्लांट्स से ली जा रही है। कोयले जैसे फॉसिल फ्यूल से चलने वाले इन पावर प्लांट्स के कारण धरती पर काफी मात्रा में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन हो रहा है, जो धरती के तापमान में बढ़ोतरी यानी ग्लोबल वॉर्मिंग का कारण बन रहा है। इस तरह AI के व्यापक उपयोग से जलवायु परिवर्तन की समस्या और विकराल हो सकती है।
अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) का अनुमान है कि 2022 में दुनिया की कुल बिजली खपत का 1.3% हिस्सा डेटा सेंटरों में इस्तेमाल हो रहा था। पेंसिलवानिया यूनिवर्सिटी के आईटी विभाग के प्रोफेसर बेंजामिन सी. ली बताते हैं कि आईटी सेक्टर की बिजली खपत में पिछले कई वर्षों में इसमें कोई खास बदलाव नहीं आया है, पर AI का इस्तेमाल बढ़ने से इसमें तेज बढ़ोतरी होने की संभावना नज़र आ रही है। 2030 तक यह 8% तक पहुंच सकती है। वह इसका कारण बताते हैं कि ChatGPT जैसे जेनरेटिव एआई मॉडल कम्प्यूटेशन में सर्च इंजन के पारंपरिक डेटा सेंटरों की तुलना में बहुत ज़्यादा पावर की खपत करते हैं। उदाहरण के लिए AI से की गई एक LLM क्वेरी के लिये 2.9 वाट-घंटे बिजली की खपत होती है, जबकि नियमित इंटरनेट सर्च के लिये 0.3 वाट-घंटे की आवश्यकता होती है। इसे इस तरह से सरलता से समझा जा सकता है कि Google पर किसी वेब सर्च में अगर 1 मात्रा में ऊर्जा की खपत होती है, तो ChatGPT से जवाब मांगने पर 7 से 10 गुना ज़्यादा ऊर्जा की खपत हो सकती है। ऐसे अगर हर कोई सर्च इंजन की तरह GPT का इस्तेमाल करना शुरू कर देगा, तो हम बिजली की खपत में एक बड़ी वृद्धि देखेंगे। एक वैज्ञानिक आकलन के मुताबिक 100 मेगावाट क्षमता वाले एक सामान्य डेटा सेंटर के लिए आवश्यक बिजली से 80,000 घरों को बिजली मिल सकती है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के आंकड़ों के मुताबिक विश्व में इस समय लगभग 9,000 से 11,000 क्लाउड डेटा सेंटर काम कर रहे हैं। ये सेंटर बड़ी मात्रा में बिजली की खपत कर रहे हैं। इसके अलावा कई डेटा सेंटर निर्माणाधीन हैं। चालू होने पर ये एआई डेटा सेंटर आने वाले समय में बिजली नेटवर्क पर स्थानीय स्तर पर एक बड़ा दबाव डाल सकते हैं। IEA के अनुमान के अनुसार अगले साल यानी 2026 तक डेटा सेंटरों की कुल बिजली खपत 1,000 टेरावाट तक पहुंच सकती है, जो जापान के वर्तमान कुल बिजली उपयोग के बराबर है।
अमेरिकी साइंस जरनल साइंटिफिक अमेरिकन के मुताबिक सिएटल के एलन इंस्टीट्यूट फॉर AI के रिसर्च साइंटिस्ट जेसी डॉज का कहना है, "बिजली की आपूर्ति हमारे विचार से कहीं अधिक जोखिम में है। बिजली कंपनियां कह रही हैं, 'हमें नहीं पता कि हम इस लोड को संभाल पाएंगे या नहीं। हमें अपने सिस्टम का ऑडिट करना होगा, क्योंकि हमने पहले कभी इस तरह की पावर डिमांड का सामना नहीं किया है।" जेएलएल में डेटा-सेंटर मार्केट के प्रबंध निदेशक एंडी सेवेंग्रोस ने एक इंटरव्यू में वाशिंगटन पोस्ट से कहा एआई बूम बिजली उत्पादन में अक्षय ऊर्जा (रिन्युएबल एनर्जी ) के योगदान को बढ़ाने के अभियान की रफ्तार को धीमा कर हर है, "क्योंकि फिलहाल हम AI सेंटर्स की बिजली की भारी मां को रिन्युएबल एनर्जी से पूरा कर पाने की स्थिति में नहीं पहुंच पाए हैं। ऐसे में AI लॉबी फॉसिल फ्यूल से चल रहे पावर प्लांट्स को रिटायर (बंद) करने के प्लान को टालने के लिए लॉबींग कर रहे हैं। AI लॉबी के साथ ही पेट्रोलियम कंपनियां भी इस लॉबींग में शामिल हैं। "क्लाइमेट एक्शन अगेंस्ट डिसइनफॉर्मेशन'’ गठबंधन ने इसका खुलासा करते हुए अपनी रिपोर्ट में कहा है फॉसिल फ्यूल कंपनियों और उनके पेड (Paid) नेटवर्क ने राजनेताओं और प्रभावशाली लोगों के जरिये ऐसे दुष्प्रचार में लगे हुए हैं। ये लोग दशकों से जलवायु संबंधी चिंताओं को नकारने और इसके खिलाफ जागरूकता फैलाने के अभियानों को बदनाम करने का काम कर रहे हैं।
2. डेटा सेंटरों से बढ़ रहा कार्बन उत्सर्जन
AI का सुचारु रूप से संचालन करने के लिए सैकड़ों-हजारों डेटा सेंटरों को 24/7 चालू रखना पड़ता है। AI सिस्टम्स को लगातार चलाए रखने के लिए डेटा सेंटरों में सर्वर और कूलिंग सिस्टम्स चलते रहते हैं, जिससे भारी मात्रा में कार्बन उत्सर्जन होता है। एक रिपोर्ट के अनुसार एक बड़े AI मॉडल से उतनी ही कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित होती है जितनी 5 कारों के पूरे जीवनकाल में उत्सर्जित होती है। AI हार्डवेयर और डेटा सेंटर वर्तमान में वैश्विक ग्रीनहाउस गैस (GHG) उत्सर्जन में 1% का योगदान करते हैं, जिसके 2026 तक दोगुना हो जाने की उम्मीद है।रिसर्च साइंटिस्ट जेसी डॉज का कहना है, "हमारे लिए इन बड़ी AI प्रणालियों से हो रहे CO2 उत्सर्जन के पर्यावरणीय प्रभावों को समझना महत्वपूर्ण है। यह पता लगाना भी जरूरी है कि AI वास्तव में जलवायु को कितना प्रभावित करेगा, क्योंकि विभिन्न प्रकार के AI मॉडल जैसे कि मशीन लर्निंग या AI आधारित किसी बड़े भाषा मॉडल (LLM) को प्रशिक्षित करने और चलाने के लिए अलग-अलग मात्रा में कंप्यूटिंग शक्ति की आवश्यकता होती है।" शोधकर्ताओं का अनुमान है कि ओपनएआई के बड़े भाषा मॉडल जीपीटी-3 के विकास के दौरान करीब 500 मीट्रिक टन कार्बन उत्पन्न हुआ।
3. कूलिंग में खर्च हो रहा लाखों गैलन पेयजल
AI डेटा सेंटरों को ठंडा रखने के लिए अत्यधिक मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। डेटा सेंटरों में लगे कूलिंग सिस्टम्स हजारों गैलन पानी प्रतिदिन उपयोग करते हैं, जिससे जल संकट की समस्या और गहराती जा रही है। कई विकसित देशों में डेटा सेंटरों के कारण जल संसाधनों की उपलब्धता प्रभावित हो रही है। हालांकि जो डेटा सेंटर अपने कूलिंग सिस्टम में पानी का इस्तेमाल करते हैं यानी वाटर-कूल्ड डेटा सेंटर कम बिजली का इस्तेमाल करने के कारण एयर-कूल्ड डेटा सेंटरों की तुलना में लगभग 10% कम कार्बन उत्सर्जन करते हैं, पर इसमें होने वाली पानी की भारी खपत इस कमी को दरकिनार कर देती है, क्योंकि डेटा सेंटरों को की जाने वाली पानी की सप्लाई का अपने आप में एक अच्छा खासा कार्बन फुटप्रिंट होता है। एक बड़े भाषाई एआई मॉडल को प्रशिक्षित करने के लिए कई मिलियन लीटर पानी की आवश्यकता होती है। चैटबॉट ChatGPT पर 20 से 50 प्रश्नोत्तरों की एक साधारण बातचीत में सिस्टम की कूलिंग में आधे से एक लीटर पानी तक की खपत हो सकती है। एक रिपोर्ट के मुताबिक 2021 में Google के डेटा केंद्रों ने 16.3 बिलियन लीटर (4.3 बिलियन गैलन) पानी का इस्तेमाल किया। 2022 में यह खपत 30% बढ़कर 21.1 बिलियन लीटर (5.6 बिलियन गैलन) हो गई। इसी अवधि में Microsoft की पानी की खपत 4.7 बिलियन लीटर (1.2 बिलियन गैलन) से 34% बढ़कर 6.3 बिलियन लीटर (1.6 बिलियन गैलन) प्रति वर्ष हो गई। AI डेटा सेंटरों में पानी की लगातार बढ़ती खपत से जुड़े ये आंकड़े इसलिए और भी चिंताजनक हो जाते हैं, क्योंकि सेंटरों को ठंडा करने के लिए स्वच्छ, बैक्टीरिया मुक्त पानी की आवश्यकता होती है, जैसाकि आमतौर पर पीने और खाना पकाने जैसे जरूरी कामों में इस्तेमाल किया जाता है। इस तरह से देखा जाए तो डेटा सेंटरों में सीधे तौर पर हमारी मानवीय जरूरतों से जुड़ा हुआ साफ पानी इस्तेमाल किया जा रहा है।
4. भारी मात्रा में पैदा हो रहा इलेक्ट्रॉनिक कचरा
AI आधारित हार्डवेयर और कंप्यूटिंग सिस्टम्स का तेजी से विकास हो रहा है, जिससे इलेक्ट्रॉनिक कचरे की समस्या बढ़ रही है। पुराने सर्वर, प्रोसेसर और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण जब अनुपयोगी हो जाते हैं, तो उन्हें फेंक दिया जाता है, जिससे पर्यावरण प्रदूषण बढ़ता है। इनमें मौजूद जहरीले रसायन मिट्टी और जल स्रोतों को प्रदूषित कर सकते हैं। संयुक्त राष्ट्र (UN) के अनुसार 2021 में दुनिया भर में कुल ई-कचरा तकरीबन 57.4 मिलियन टन था, जो इतिहास में अब तक का सबसे अधिक था। वर्ष 2030 तक जनरेटिव एआई के चलते दुनिया में कुल 5 मिलियन मीट्रिक टन ई-कचरा निकलने वाला है। इसे देखते हुए वैज्ञानिकों का कहना है कि ई-कचरे का सही प्रबंधन न होने पर यह मिट्टी और जल प्रदूषण को बढ़ा सकता है। WHO के अनुसार दुनिया भर में निकलने वाला ई-कचरा पर्यावरण में 1,000 से अधिक विभिन्न रासायनिक पदार्थों को छोड़ सकता है। मौजूद सीसा, पारा, कैडमियम जैसे विषाक्त पदार्थ (न्यूरोटॉक्सिकेंट्स) मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं, जो विभिन्न बीमारियों का कारण बन सकते हैं। यह खासतौप पर गर्भवती महिलाओं और बच्चों की सेहत के लिए काफी ज्यादा खतरनाक होते हैं। AI के कारण ई-कचरे की तेजी बढ़ती मात्रा, पर्यावरणीय असंतुलन को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती है। इसलिए इसके समाधान के लिए रीसाइक्लिंग और स्थायी तकनीकी विकास आवश्यक है।
5. प्राकृतिक संसाधनों का बढ़ रहा है दोहन
AI सिस्टम्स को कार्यशील बनाने के लिए सिलिकॉन, लीथियम, और अन्य दुर्लभ खनिजों की आवश्यकता होती है। इन खनिजों के खनन से प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन होता है, जिससे पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचता है। खनन कार्यों से मिट्टी के क्षरण के साथ ही भारी मात्रा में प्रदूषण की भी समस्या पैदा हो रही है। इसके अलावा माइनिंग में अंधाधुंध तरीके से बढ़ोतरी होने के चलते काफी बड़े इलाकों में जैव विविधता को भी नुकसान पहुंच रहा है। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में इलेक्ट्रिकल और कंप्यूटर इंजीनियरिंग के एसोसिएट प्रोफेसर शाओली रेन का कहना है, '’AI सिस्टम्स के हार्डवेयर को तैयार करने के लिए कच्चे माल के खनन की आवश्यकता होती है। यह एक लेबर इंटेंस काम होने के साथ ही पर्यावरण की दृष्टि से भी हानिकारक होता है।"
AI के साइड इफेक्ट्स को रोकने के लिए अबतक क्या किया गया है?
राहत की बात यह है कि AI से पर्यावरण पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों को रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुछ नीतिगत प्रयासों की शुरुआत हो गई है। हालांकि यह कोशिशें अपने शुरुआती स्तर में होने के चलते फिलहाल नाकाफी दिखाई दे रही हैं, पर उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में इसमें तेजी और सक्रियता में बढ़ोतरी देखने को मिलेगी। AI के पर्यावरणीय प्रभावों से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अबतक उठाए गए कदमों को इस प्रकार देखा जा सकता है:
UNFCCC का COP 29 प्रस्ताव : अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार संघ द्वारा अज़रबैजान के बाकू में आयोजित UNFCCC 2024 व COP 29 सम्मेलन में AI कंपनियों की ओर से अपने डेटा सेंटरों में इनवायर्नमेंट फ्रेंडली प्रक्टिसेज को बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया गया है।
कानूनी कार्यवाहियां : टेक्नोलॉजिकल इनोवेशन और सस्टेनबिलिटी को बढ़ा कर AI के कार्बन फुटप्रिंट को कम करने के लिए यूरोप में यूरोपीय संघ AI अधिनियम 2024 और अमेरिका में Artificial Intelligence Environmental Impact Act 2024 जैसे कानून पारित किए गए हैं।
ग्लोबल एथिकल AI गाइडलाइंस : 190 से अधिक देशों ने UNESCO की ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता की नैतिकता पर अनुशंसा’ (Recommendation on the Ethics of Artificial Intelligence) में एथिकल AI गाइडलाइंस को अपनाने की बात कही है, हालांकि फिलहाल इसे गैर-बाध्यकारी रखा गया है। फिर भी, इससे AI के कार्बन फुटप्रिंट और बिजली की खपत कुछ हद तक काबू होने की उम्मीद है।
AI एक्शन समिट 2025 : संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने AI तकनीक में अग्रणी देशों से आग्रह किया है कि वे ऐसे AI एल्गोरिदम और अवसंरचना डिजाइन करें, जो कम ऊर्जा की खपत करें तथा ऊर्जा उपयोग को अनुकूलित करने के लिये AI को स्मार्ट ग्रिड में एकीकृत करें।
UNEP की सिफारिशें : UNEP ने AI के पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने के लिये पाँच प्रमुख रणनीतियाँ प्रस्तावित की हैं:
कैसी हो आगे की राह
हालांकि AI के नकारात्मक प्रभाव चिंताजनक हैं, लेकिन कुछ उपायों से इसे नियंत्रित किया जा सकता है।इनमें तकनीकी और नीतिगत दोनों उपाय शामिल हैं। तकनीकी पक्ष की बात करें, तो AI सिस्टम को पर्यावरण दक्षता (Environmental Efficiency) को ध्यान में रखते हुए डिज़ाइन किया जाना चाहिए। इसमें ग्रीन कंप्यूटिंग, इको-डिज़ाइन और जीवन चक्र मूल्यांकन (life cycle assessment) जैसे सिद्धांतों का पालन किया जाना चाहिए। इस तरह AI सिस्टम को अपनी ऊर्जा खपत, सामग्री उपयोग और ई-कचरे को कम से कम करना चाहिए और अपने प्रदर्शन को बेहतर बनाते हुए रीसाइक्लिंग को बढ़ाना चाहिए। नीतिगत पक्ष पर की बात की जाए तो सरकारों को AI प्रणाली को नियंत्रित करने के लिए ऐसा व्यापक फ्रेमवर्क बनाना चाहिए, जिसमें AI सिस्टम के पूरे जीवन काल में उससे पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों को ध्यान में रखा जाए। इसमें पर्यावरणीय प्रभाव को मापने के लिए स्पष्ट लक्ष्य और संकेतक (Indicator) निर्धारित करना, ग्रीन AI प्रैक्टिसेज को बढ़ावा देने के लिए कानूनी ढांचा तैयार व लागू करना चाहिए। इसके साथ ही इन मामलों में निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में स्टेकहोल्डर्स के सहयोग और सार्वजनिक भागीदारी को बढ़ावा देना चाहिए। मोटे तौर पर नीतिगत स्तर पर यह कदम उठाए जा सकते हैं :
मानकों पर आधारित जवाबदेही तय करना : सरकारों को विभिन्न तकनीक, उत्सर्जन औश्र कचरे के निपटान जैसी चीजों के लिए मानक तय करके AI डेटा सेंटरों की जवाबदेही सुनिश्चित करनी चाहिए। इसके साथ ही AI डेटा सेंटरों को चलाने वाली टेक कंपनियों को एआई के AI पर्यावरणीय प्रभावों की जानकारी देने की एक पारदर्शी व्यवस्था लागू की जानी चाहिए।
नियामक ढांचा तैयार करना : स्थिरता लक्ष्यों के साथ संरेखित करते हुए, एआई के संसाधन के उपयोग की निगरानी और रोकथाम हेतु विनियमन लागू करना। ऊर्जा और जल संरक्षण तकनीकों का उपयोग कर डेटा सेंटरों में बिजली और पानी की खपत कम की जानी चाहिए।
टेक्निकल इनोवेशन को बढ़ावा : हरित एआई समाधानों हेतु अनुसंधान एवं विकास में निवेश करना तथा प्रदर्शन को बनाए रखते हुए पर्यावरणीय प्रभाव को कम किया जाए। इसके लिए एनर्जी एफिसिएंट AI मॉडल विकसित किए जाएं।
सर्कुलर इकोनॉमी मॉडल अपनाना : संसाधनों की खपत को घटाने और ई-कचरे के निपटान के लिए संसाधनों की रिसाइक्लिंग पर जोर देने वाली अर्थव्यवस्था (Circular economy approach) के सिद्धांत को अपनाया जाना चाहिए। इसके तहत AI डेटा सेंटरों को रिन्युएबल एनर्जी से चलाने के व्यवस्था लागू की जानी चाहिए। साथ ही डेटा सेंटरों के ई-कचरे की recycling और reuse को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
AI तकनीक से मिल रहे तमाम फायदों और सुविधाओं के बावजूद पर्यावरण पर इसके नकारात्मक प्रभावों को अनदेखा नहीं किया जा सकता। इसलिए भविष्य में अधिक टिकाऊ और इको फ्रेंडली AI के विकास की दिशा में प्रयास और साझा पहल करना बेहद जरूरी हैं। इसके तहत रिन्युएबल एनर्जी, बेहतर ई-वेस्ट मैनेजमेंट और संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग पर जोर देकर AI के नकारात्मक प्रभावों को कम किया जा सकता है।
AI-data-center, Side effects of AI
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