महाकुंभ का महाद्वंद्व : किसको मिला पुण्‍य, किसके धुले पाप !


  • कौस्‍तुभ उपाध्‍याय



गंगा किनारे तुलसी और रुद्राक्ष की माला बेचती मोनालिसा की मन-मोहिनी आंखों से लेकर आईआईटीयन बाबा की अतरंगी बातों तक। सोशल मीडिया पर महाकुंभ की रील्‍स ने कुछ ऐसा जलवा बिखेरा, ऐसा माहौल बनाया कि देश-विदेश से लोगों का अभूतपूर्व रेला उमड़ पड़ा इस महा मेले में आस्‍था की डुबकी लगाने के लिए। संगम की रेत पर प्रयागराज में उमड़े अपार जन-सैलाब ने पिछले सारे रिकॉर्डों को मानो गंगा की धारा में प्रवाहित कर दिया। 


मेले में भगदड़, आग, अव्‍यवस्‍था और वीआईपी कल्‍चर से होने वाली दिक्‍कतों जैसी दुश्‍वारियों और दुर्घटनाओं के बावजूद श्रद्धालुओं के उत्‍साह में ज़रा भी कमी न आने से ने यह तो साबित हो गया कि लोगों आस्‍था की गहराई यकीनन गंगा-यमुना के पानी की गहराई से भी कहीं ज्‍यादा गहरी है। पर, कई वर्ग किलोमीटर तक फैले विशल मेला क्षेत्र में उभरता गंदगी का अंबार और अव्‍यवस्‍थाएं मेले की इस चमक-दमक के पीछे के स्‍याह पहलू की भी झलक दिखा रही हैं। गंगा-जमुना के जल की बदतर होती हालत कहीं न कहीं ज़हन में एक गंभीर सवाल भी उठा रही है। सवाल यह कि लोगों की इस श्रद्धा में स्‍वच्‍छता, शुचिता, सहयोग और सेवा का भाव क्‍यों नज़र नहीं आया। 


सवाल यह भी उठता है तन-मन पवित्र करने की चाह में 'गंगा मइया' के आंचल में टनों गंदगी बिखेर जाने वाले लोग ज्‍यादा आस्‍थावान हैं, या फिर मुट्ठी भर लोगों का वह समूह, जो पूजा-पाठ, अर्घ्‍य-आचमन, आरती-वंदन करने के बजाय चुपचाप गंगा, यमुना और अपने आस-पास की नदियों, पोखरों, तालाबों और कुओं जैसी जल-राशियों की सफाई में जुटा हुआ है। वह भी बिना कोई दिखावा या प्रचार किए। सोचने वाली बात यह है कि कुंभ के नाम पर गंगा-यमुना में गंदगी बिखेरती भीड़ का जिक्र तो 'महिमा मंडन' भरे स्‍वर में हर ओर हो रहा है, पर नदियों सी साफ-सफाई करते 'मूक नायकों' का भूले से भी कहीं नाम नहीं लिया जा रहा है। बेतरतीब घूमती भीड़ का यह ‘गौरवगान’ और ज़मीन पर जुटकर सार्थक काम करने वालों के प्रति सोशल मीडिया और मेन स्‍ट्रीम मीडिया की इस खामोशी के पीछे की वजह संवेदनशील और विवेकशील लोगों को सोचने-विचारने पर मजबूर करने वाली है। थोड़ा सा चिंतन कीजिए, तो इस जानबूझ कर साधी गई इस चुप्‍पी या ‘डेलिब्रेट इग्‍नोरेंस’ में छुपा संदेश अपने आप 'डिकोड' हो जाता है। साफ समझ में आ जाता है कि किस तरह देश के बहुसंख्‍यक समाज आस्‍था की आड़ में कुंभ मेले को राजनीतिक ध्रुवीकरण और सत्‍ता पक्ष की विचारधारा की जड़ों को और गहरा करने का एक औज़ार बना कर रख दिया गया है। 


यही वजह है कि संगम में स्‍नान करने वालों की संख्‍या के करोड़ों के आंकड़ों को तो हर रोज जमकर हाईलाइट किया जा रहा है, पर नदियों की साफ-सफाई और संरक्षण के लिए धरातल पर काम करने वालों का कहीं कोई जि़क्र नहीं हो रहा है। जबकि, यह होना चाहिए और जोर-शोर से होना चा‍हिए। ताकि, महाकुंभ में स्‍नान को उमड़ रहे अपार जन-समूह को एक संदेश और प्रेरणा दी जा सके कि असली पुण्‍य केवल गंगा में नहाने, डुबकी लगाने से नहीं, बल्कि उसकी साफ-सफाई का प्रयास करने से, उसके जल को स्‍वच्‍छ और निर्मल बनाने की कोशिशों में शामिल होने से मिलने वाला है। आस्‍था के नाम पर गंगा में केवल गंदगी बिखेर कर चले जाने से ‘पाप-मुक्ति’ नहीं, बल्कि ‘पाप-वृद्धि’ ही होती है। 


कितना अच्‍छा होता कि कुंभ के मौके पर मीडिया केवल सेलि‍ब्रिटीज डुबकियों, मठाधीशों के शाही स्‍नान, सरकार की ‘कथित' दिव्‍य और भव्‍य व्‍यवस्‍था का गुणगान करने और मेले में आए श्रद्धालुओं की रिकॉर्ड संख्‍या का एक-राग अलापने के साथ ही पटना में गंगा घाटों की सफाई करने वाले अभिषेक आनंद, शैलेश जैसे युवाओं की टोली के सार्थक प्रयासों को हाइलाइट करता। कुंभ में लंगर लगाने और प्रसाद बंटवाने वाले देश के कॉरपोरेट दिग्‍गजों को बताया जाता कि किस तरह ‘इकोसत्‍व' नाम की एक छोटी सी स्‍टार्टअप कंपनी महाराष्‍ट्र के औरंगाबाद में नाले में बदल चुकी खाम नदी को अपने कॉरपोरेट सोशल रिस्‍पॉ‍न्‍सबिलिटी (CSR) फंड से धन देकर शहर वासियों के सहयोग से पुन‍र्जीवित करने की मुहिम चला रही है। इसकी मिसाल देकर कुंभ मेले में आने वाले देश के बड़े उद्योगपतियों से गंगा स्‍वच्‍छता में आर्थिक योगदान देने की अपील की जा सकती थी। साथ ही जनसहयोग से चल रहे इस अभियान के बारे में आम लोगों को बता कर मेले में आने वाले श्रद्धालुओं से गंगा की सफाई में एकाध घंटे का स्‍वैच्छिक श्रमदान करने की अपील भी की जा सकती थी। सोचिए, अगर करोड़ों हाथ दस-दस मिनट भी गंगा-यमुना और उसके तटों को साफ करने में जुट जाते तो कितना कुछ किया जा सकता था। इसके साथ ही अगर कुंभ के श्रद्धालुओं से वहां पंडों-पुरोहितों को दान देने के साथ ही अपनी क्षमतानुसार कुछ छोटी-मोटी रकम नमामि गंगे अभियान के तहत बनाए गए गंगा स्‍वच्‍छ गंगा कोष (Clean Ganga Fund) के लिए भी दान देने का आह्वान किया जाता, तो इस फंड में करोड़ों रुपये चुटकियों में जमा हो जाते। 


मीडिया इस मौके पर लोगों को गंगा-यमुना के दोआब में स्थित अलीगढ़ में जल प्रदूषण पर नियंत्रण के किए जा रहे रिसर्च के बारे में भी जानकारी दे सकता था। लोगों को बताया जा सकता था कि किस तरह अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) के वैज्ञानिकों की टीम ने नदी की रेतीली जमीन पर बांस, विलो और मैंग्रोव के पौधे लगाकर प्रदूषित जल को प्राकृतिक तरीके से साफ करने की कारगर तकनीक खोज निकाली है। इससे गंदे जल की सफाई के साथ ही आसपास के इलाकों में भू-जल स्‍तर को बढ़ाने में भी काफी मदद मिल रही है। कुंभ की खबरों के साथ इस खबर को भी हाईलाइट करके स्‍थानीय संस्‍थाओं से गंगा-यमुना के तटीय इलाकों में बांस, मैंग्रोव, यूकेलिप्टिस और विलो के पौधे लगवाए जा सकते थे। मेला क्षेत्र में जगह-जगह काउंटर लगवा कर लोगों से पांच-दस रुपये में ये पौधे लेकर ‘गंगा मइया की खातिर पौधरोपण’ के कार्यक्रम आयोजित किए जा सकते थे। पर आधा से ज्‍यादा मेला बीत जाने के बावजूद अबतक ऐसा कहीं भी देखने को नहीं मिला है। 


 

तरकीबन ऐसा ही निराशाजनक नज़ारा सोशल मीडिया पर भी देखने को मिला। आज के दौर में मेन स्‍ट्रीम मीडिया से ज्‍यादा ताकत और अलग पहचान रखने वाला सोशल मीडिया भी एक तरह से न्‍यूज चैनलों, पोर्टल्‍स और अखबारों की खींची गई लकीर पर ही चलता नज़र आया। ज्‍यादातर लोग मेले में मौज-मस्‍ती और सैर-सपाटे के वीडियो और तस्‍वीरें ही फेसबुक, इंस्‍टाग्राम और X (ट्वीटर) पर अपलोड करते नज़र आए। कुछ अलग हट कर और सार्थक प्रयास करने जैसा कहीं कुछ नहीं दिखा। सोशल मीडिया इन्‍फ्लुएंसर्स भी कोई सकारात्‍मक संदेश देने के बजाय केवल अपने जलवे बिखेरते ही नज़र आए। कई तरह के फिल्‍टर लगाकर, बेहतरीन एडिटिंग वाली तस्‍वीरें और वीडियो अपने फॉलोअर्स को परोसने के साथ ही अगर वे लोगों से मेला क्षेत्र में गंदगी न फैलाने, साफ-सफाई बनाए रखने और सहयोग व अनुशासित व्‍यवहार करने की अपील करते तो मेले का माहौल शायद बेहतर हो सकता था। या फिर कोई अच्‍छा काम जैसे गंगा तट की सफाई, भूले-भटके लोगों की मदद, बुजुर्गों, असहायों की सहायता के वीडियो डाल कर सभी श्रद्धालुओं से भी कुछ ऐसा ही करने की अपील की जा सकती थी। पर, अफसोस की बात है कि लाखों-करोड़ों फॉलोवर्स का दम भरने वाला कोई एक भी इन्‍फ्लुएंसर ऐसा करता नज़र नहीं आया। 


कुल मिलाकर कहा जाए, तो हमने अपनी नदियों को साफ रखने, जल, ज़मीन और हवा के प्रदूषण के खिलाफ जागरूकता फैलाने और इसमें जनसहयोग बढ़ाने का एक बेहतरीन मौका फालतू की शोशेबाजि़यों में खो दिया। सरकारें जहां, कुंभ मेले को एक पॉलिटिक इवेंट बनाकर इसका राजनीतिक लाभ लेने की कवायद में जुटी नज़र आईं, वहीं मीडिया और सोशल मीडिया भी कुछ सार्थक और सकारात्‍मक करने में इंट्रेस्‍टेड नज़र नहीं आया। वर्ना जिस मेले में करीब महीने भर तक लगातार करोड़ों लोगों के आने-जाने का सिलसिला लगा रहा, वहां लोगों के सहयोग से देश, समाज और पर्यावरण के लिए काफी कुछ सकारात्‍मक किया जा सकता था। 


बहरहाल, कहते हैं कि उम्‍मीद पर दुनिया क़ायम है और कुंभ मेला भी शिवरात्रि तक अभी कई दिन और चलना है। उम्‍मीद है कि बाकी बचे दो हफ्तों में मेला-भूमि में शायद कुछ अच्‍छा और सकारात्‍मक देखने को मिल जाए।


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